कोविड महामारी की समाप्ति हेतु, ओमीक्रोन प्रकृति का वरदान है।

Author – Prof Pankaj Chaturvedi, Tata Memorial Centre, Mumbai

नवंबर 2021 तक दुनियाभर में कोविड 19 बीमारी के 26 करोड़ मामले और 50 लाख दुखदाई मौतें दर्ज हुईं। इतने भयानक एवं व्यापक स्तर पर लोगों के जीवन पर प्रभाव डालने के कारण शायद ही कोई ऐसा होगा जो इस बीमारी से अनभिज्ञ हो। यह इतिहास की सबसे वीभत्स आपदा है। वैसे तो यह वायरस आज के विकसित समाज के समक्ष केवल एक निर्जीव इकाई है, जिसका कोशिकाओं के बाहर अस्तित्व तक नहीं। बावजूद इसके, दुनियाभर में लोग इस बीमारी से सहमे हैं। दुनिया कोरोना वायरस के डेल्टा स्वरूप से मची तबाही से धीरे-धीरे उबर रही थी, लेकिन इसी बीच ओमीक्रोन के उभरते स्वरूप ने फिर से भय को पुनर्जीवित कर दिया है। इस आर्टिकल के ज़रिए यह बताने पर ज़ोर दिया गया है कि कैसे ओमीक्रोन दुनियाभर से कोरोना को खत्म करने में वरदान साबित हो सकता है। यह कोविड के खिलाफ़ वैक्सीनेशन के उद्देश्य को और संबल प्रदान करेगा।

कोरोना वायरस ने पिछले २ सालों  में सभी पारम्परिक ज्ञान और वैज्ञानिक सोच को हिला कर रख दिया है ! सभी भविष्यवाणियां गलत साबित हो गयीं। प्रथम एवं दूसरी वेव के दौरान सारे शोधक एवं चिकित्सक वायरस को खत्म या नियंत्रित करने में असफल रहे. मुझे अहसास है कि  ओमीक्रॉन के बारे में मेरा आशावाद भी गलत हो सकता है परंतु उसकी संभावना कम है। मानवता आभारी है उन वैज्ञानिकों की जिन्होंने रिकॉर्ड समय में वैक्सीन को ईजाद किया। कोविड के खिलाफ जंग में यही एक प्रभावकारी तरीका उभर कर आया है जो ओमिक्रोन के खिलाफ भी कारगर है। मैं हर भारतीय को वैक्सीन लेने के लिए आग्रह करूंगा। जिन लोगों ने वैक्सीन के दोनो डोज लिएं हैं उनमें कोविड होने की संभावना बहुत कम है। अगर वेसिनेटेड इंसान को कोविड हो भी गया तो गंभीर बीमारी होने की संभावना बहुत कम है।

इन दिनों म्यूटेशन को लेकर खूब चर्चा चल रही है, जिसमें म्यूटेशन के कारण प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया से वायरस के बचने की क्षमता और संक्रामकता तथा मृत्यु दर में इससे बढ़ोतरी पर सबसे अधिक बल दिया जा रहा है।म्यूटेशन जीन के आनुवंशिक संरचना के परिवर्तन या गुणसूत्र को दर्शाता है, जो अगली पीढ़ियों में संचारित होता है। हम सब जानते हैं कि वायरस का म्यूटेशन मानव कोशिका की तुलना में बहुत अधिक होता है। इंट्रा सेल्यूलर वातावरण के आधार पर, वायरस रैंडम म्यूटेशन से गुजरता है, जो इसे जीवित रहने का अवसर भी दे सकता है और साथ ही इसे पनपने में विफल भी कर सकता है। ऐसे में वायरस लाभप्रद म्यूटेशन के लिए संघर्ष करेगा, जबकि कोशिका का लक्ष्य इसे नियंत्रण में या समाप्त करने पर होगा। वैसे तो वायरस स्मार्ट आक्रमणकारी होते हैं, लेकिन ये इंसानी कोशिकाओं की बुद्धिमत्ता को टाल नहीं सकता, जिसने साल दर साल विकास की प्रक्रिया के माध्यम से जीवित रहने की कला में महारत हासिल की है। 

म्यूटेशन के बाद सार्स कोविड-2 मजबूत होता है या कमजोर या जानने के लिए हमने इसका विश्लेषण करने की कोशिश की है। हालांकि समाज में लोकप्रिय धारणा है कि 2021 में डेल्टा वेरिएंट के कारण कोरोना की दूसरी लहर आई थी, जो 2020 के पहली लहर की तुलना में अधिक घातक रही। अब डर है कि ओमीक्रोन के कारण तीसरी लहर आएगी, जो और भी घातक हो सकती है। इसका असर कितना घातक होगा यह अभी भविष्य के गर्भ में है, लेकिन वायरस के बेसिक स्वभाव के आधार पर बहुत कुछ आंका जा सकता है। ऐसे में आइए वायरस के म्यूटेशन और इसके परिणामों को समझने की कोशिश करते हैं।

आरएनए वायरस जैसे, कोरोना वायरस, इन्फ्लूएंजा और एचआईवी वायरस अस्थिर मॉलिक्यूल हैं,जो म्यूटेशन के लिए जाने जाते हैं। एचआईवी वायरस बहुत तेजी से पुनरुत्पादन करता है, जिससे हर दिन यह खुद की अरबों कॉपियां बनाता है। यही कारण है कि अब तक किसी भी एचआईवी वैक्सीन का प्रभावी असर क्लीनिकल ट्रायल में नहीं दिखा हैं, जो कि इसे मान्यता दिलाने में अहम है। संक्षेप में, म्यूटेशन वायरस के जीवन चक्र में होने वाली नियमित घटनाएं हैं और कोविड -19 वायरस इससे अलग नहीं है। हालांकि, ज्यादातर म्यूटेंट वेरिएंट कमजोर होते हैं और इनमें संक्रमण और फैलने (संचारण) की क्षमता कम हो जाती है। ऐसे कमजोर वायरस के कारण कम लक्षण वाले इन्फैक्शन होते हैं, जो हर्ड इम्युनिटी को लाने में मददगार होते हैं, देखा जाए तो एक तरीके से वैक्सीन भी यही करती है। इस तरह के हर्ड इम्युनिटी को बहुत तेजी से प्राप्त किया सकता है, यदि म्यूटेशन के कारण इन्फैक्शन बढ़ता है, लेकिन इसके कारण होने वाली गंभीरता कम रहती है, तो ऐसे में संभावना है कि कोविड-19 में होने वाला म्यूटेशन इसे एंडेमिक की तरफ ले जाएगा या इससे होने वाली गंभीरता को कम करेगा। सौभाग्यवश, वर्तमान के ट्रेंड के अनुसार, ओमीक्रोन अधिक संक्रामक है, लेकिन कम घातक। सामान्य शब्दों में इसे इस तरह समझा जा सकता है कि विकसित दुनिया कम विकसित दुनिया को टीका उपलब्ध कराने में विफल रही है, ऐसे में ओमीक्रोन वंचित तबके का टीकाकरण करने जैसा भी साबित हो सकता है !

अब सवाल उठता है कि हम समाज के लिए इन म्यूटेशन के लाभकारी भूमिका को कैसे सिद्ध करते हैं?

तो जैसा कि हम सब जानते हैं कि दूसरी लहर काफी हद तक म्यूटेशन के कारण पैदा हुए नए स्ट्रेन के कारण थी। ऐसे में आइए भारत में इन दोनों स्ट्रेन के व्यवहार को पहली और दूसरी लहर में संक्रामकता और मृत्यु दर के आधार पर तुलना करके देखते हैं। संक्रमण मृत्यु दर और केस मृत्यु दर वायरल संक्रमण की गंभीरता को आंकने के दो पैरामीटर हैं, जो पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर में कम थी। भारत की ही तरह, अधिकांश यूरोपीय देशों ने भी 2020 की महामारी के दो लहर देखे, जिसमें पहली लहर वसंत के दौरान और दूसरी लहर देर से गर्मियों या पतझड़ ऋतु के दौरान एक नए वेरिएंट से शुरू हुई। आंकड़ों के अनुसार, दूसरी लहर के दौरान ज्यादातर मरीज युवा रहें जिन्हें कम समय के लिए अस्पताल में भर्ती करना पड़ा, वहीं पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर में मामलों को सापेक्ष मृत्यु दर कम रही। इसी तरह कनाडा के एक अध्ययन के अनुसार, ओंटारियो में भी दूसरी लहर के दौरान (31 जुलाई 2020 से) सीएफआर रेट में काफी कमी देखी गई थी। एक अन्य अध्ययन में 53 देशों में पहली और दूसरी लहर के बीच मामलों की मृत्यु दर (सीएफआर) की तुलना की गई। इनमें उन देशों को शामिल किया गया था जहां मृत्यु दर सबसे अधिक बताई गई थी, हालांकि दिलचस्प बात यह है कि 53 देशों में से 43 देशों में पहली लहर की तुलना में दूसरी लहर में सीएफआर रेट कम रहा।

अब हो सकता है कि दूसरी लहर में कम मृत्यु दर के लिए कुछ लोग उस दौरान इस बीमारी से इलाज के लिए इस्तेमाल होने वाली दवाइयों की भूमिका को रेखांकित कर सकते हैं। हालांकि उपरोक्त अध्ययनों के आधार पर दो समयावधि में मृत्यु दर में कमी को पूरी तरह से बेहतर उपचार के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। हम सब जानते हैं कि दूसरी लहर के दौरान उपयोग की जाने वाली कई दवाएं जैसे कि हाइड्रोक्सी-क्लोरोक्वीन,एज़िथ्रोमाइसिन, रितोनवीर, लोपिनवीर, टोसीलिज़ुमैब आदि कई बेहतर तरीके से किए गए अध्ययनों में अप्रभावी पाए गए थे। कम मृत्युदर के पीछे एक मुमकिन व्याख्या वायरस के क्षीणन या कमजोर होने में निहित है, जो कि म्यूटेशन या क्रॉस रिएक्टिविटि के कारण संभव हुआ है, इसका इन्फ्लुएंजा वायरस में अच्छी तरह से अध्ययन किया गया है। हो सकता है कि आज का सामान्य सर्दी कोरोनावारस (कोल्ड कोरोनावायरस) की भी शुरुआत कभी सार्स कोविड-2 जैसे महामारी की तरह हुई होगी, हालांकि समय के साथ यह सौम्य रूपों में बदल गया और एक सामान्य वायरस की तरह रहने लगा।

हाल के कुछ वेरिएंटस जैसे, डेल्टा या ओमीक्रोन स्पाइक प्रोटीन में म्यूटेशन के साथ सबसे पहले भारत, ब्राजील, साउथ अफ्रीका में मिले, जिनमें एक से दूसरे में तेजी से फैलने के साक्ष्य मिले, लेकिन बीमारी के कारण गंभीरता या मृत्युदर में समानुपातिक वृद्धि अब तक नहीं देखने को मिली है। अधिक संचाऱण एवं कम मृत्यु दर से हर्ड इम्युनिटी को तेजी से प्राप्त करने में मदद मिलेगी, जिससे महामारी के अंत का भी रास्ता साफ होगा। कहने की जरूरत नहीं है कि, इस तरह का निष्कर्ष निकालना समय से पहले हो सकता है, क्योंकि कई म्यूटेशन प्रतिरक्षा से बचने और इसके परिणामों के लिए जिम्मेदार हो सकते हैं।

उच्च मृत्यु दर वाले अधिकांश वायरस जैसे, मारबर्ग वायरस, इबोला वायरस, हंता वायरस, लास वायरस खुद के लिए ही खतरा बन जाते हैं, क्योंकि वे अपने होस्ट को ही मार देते हैं। जबकि वायरस जो कम घातक होते हैं, वे जीवित प्राणियों के साथ घूल-मिलकर रहते हैं, जो अनुकूल म्यूटेशन के माध्यम से अपना अस्तित्व सुनिश्चित करते हैं। लाखों वर्षों में, इन वायरस ने होमो सेपियन्स और उनके जीनोम विकास में आकार देने में योगदान दिया है। 2016 में, वैज्ञानिकों ने मानव जीनोम में एकीकृत एक ऐसे वायरस की खोज की, जो हमारे पूर्वजों से आया है और वे लोग इस वायरस से आज से लगभग 4.5 करोड़ से 6 करोड़ वर्ष पहले इससे संक्रमित हुए होंगे। वायरस के ऐसे कई उदाहरण हैं जिन्होंने हमारे जीनोम और मानव विकास को आकार दिया होगा। ऐसे में यह प्रश्न उठना लाजमी है कि वायरस इंसान के दोस्त हैं या दुश्मन? विकासवादी जीवविज्ञानी उन्हें “उन्मादी” कहेंगे, क्योंकि तत्काल प्रभाव के संदर्भ में वे निस्संदेह हमारे दुश्मन हैं। हालांकि, हजारों वर्षों में मानव विकास को देखते हुए, वे हमारे जीनोम की बेहतरी और बेहतर प्रजातियों के निर्माण में योगदान करते आए हैं।

अंत में यही कहना चाहूंगा कि तमाम चिकित्सा प्रगति के बावजूद भी महामारी दुनिया भर में आबादी को तबाह करना जारी रखती है, ऐसे में हम कोशिकाओं की अंतर्निहित बुद्धिमत्ता पर भरोसा कर सकते हैं, जो हमें इस तरह की कई समस्या से जीत दिलाने में और मजबूती से इनसे बाहर आने में मदद कर सकती है। ओमीक्रोन महामारी को प्रभावी ढंग से और स्थायी रूप से नियंत्रित करने का प्रकृति का यही तरीका हो सकता है।

Published by Chaturvedi Pankaj

Deputy Director, Center for Cancer Epidemiology, Tata Memorial Center, Mumbai. Professor, Department of Head Neck Surgery, Tata Memorial Hospital, Mumbai

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